
कुमाऊँ टाइगर : पं. मदन मोहन उपाध्याय की अदम्य गाथा, जिन्होंने अंग्रेजी हुकूमत को हिला दिया था , रानीखेत द्वाराहाट के पहले विधायक की पुण्य तिथि पर विशेष लेख।
“मदना मोहना त्येरि जै-जैकारी हो, त्वी ल्याछै स्कूल मदना, त्वी ल्याछै गाड़ी…” द्वाराहाट के ऐतिहासिक स्याल्दे मेले में आज भी जब यह लोक झोड़ा गूंजता है तो वह केवल एक गीत नहीं रहता, बल्कि उस जननायक की स्मृति को जीवंत कर देता है जिसने अपना पूरा जीवन राष्ट्र और समाज की सेवा को समर्पित कर दिया। यह नाम है— #पंडित_मदन_मोहन_उपाध्याय, जिन्हें पूरा कुमाऊँ प्रेम और सम्मान से “कुमाऊँ का टाइगर” कहकर पुकारता है।

एक साधारण परिवार से राष्ट्रीय नेतृत्व तक
25 अक्टूबर 1910 को अल्मोड़ा जनपद के द्वाराहाट क्षेत्र के बमनपुरी गांव में जन्मे मदन मोहन उपाध्याय का बचपन का नाम मथुरा दत्त था। उनके पिता जीवानंद उपाध्याय मिशन स्कूल, द्वाराहाट में अध्यापक थे। महामना मदन मोहन मालवीय से प्रभावित होकर उन्होंने अपना नाम बदलकर मदन मोहन रख लिया।

प्रारंभिक शिक्षा द्वाराहाट और नैनीताल में प्राप्त करने के बाद वे उच्च शिक्षा के लिए इलाहाबाद पहुंचे। यहीं से उनके जीवन ने नया मोड़ लिया। उनके बड़े भाई शिवदत्त उपाध्याय मोतीलाल नेहरू और बाद में जवाहरलाल नेहरू के निजी सचिव थे। आनंद भवन में रहने के दौरान मदन मोहन उपाध्याय को देश के शीर्ष नेताओं—महामना मालवीय, सरदार वल्लभभाई पटेल, जवाहरलाल नेहरू और अन्य स्वतंत्रता सेनानियों का सान्निध्य मिला। आनंद भवन केवल एक भवन नहीं था, बल्कि आज़ादी की लड़ाई का धड़कता हुआ केंद्र था। यही वातावरण किशोर मदन मोहन के मन में राष्ट्रभक्ति की ऐसी ज्योति जला गया, जिसने जीवनभर उन्हें संघर्ष के पथ पर अग्रसर रखा।

16 वर्ष की उम्र में जेल यात्रा
राष्ट्रभक्ति का जज़्बा इतना प्रबल था कि मात्र 16 वर्ष की आयु में वे कमला नेहरू के साथ गिरफ्तार होकर नैनी जेल भेजे गए। यह उनके संघर्षमय जीवन की पहली जेल यात्रा थी। इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। वकालत की शिक्षा पूरी कर 1936 में रानीखेत लौटे और कांग्रेस के माध्यम से स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय हो गए। उनकी कार्यशैली, नेतृत्व क्षमता और निर्भीकता ने उन्हें शीघ्र ही क्षेत्र के प्रमुख नेताओं की पंक्ति में ला खड़ा किया। वे रानीखेत छावनी परिषद के उपाध्यक्ष बने, प्रांतीय कांग्रेस कमेटी और बाद में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सदस्य भी रहे।

जब अंग्रेज सरकार ने घोषित किया इनाम
1942 का भारत छोड़ो आंदोलन स्वतंत्रता संग्राम का निर्णायक मोड़ था। मदन मोहन उपाध्याय अंग्रेजी शासन के लिए सबसे बड़ी चुनौतियों में शामिल हो चुके थे। उन्हें गिरफ्तार कर जेल ले जाया जा रहा था, लेकिन नैनीताल के निकट गेठिया में उन्होंने पुलिस को चकमा देकर ऐसा साहसिक पलायन किया, जिसकी चर्चा दूर-दूर तक हुई। अंग्रेज सरकार बौखला गई। उन पर जिंदा या मुर्दा पकड़ने के लिए एक हजार रुपये का इनाम घोषित कर दिया गया। उस दौर में यह राशि बहुत बड़ी मानी जाती थी और यह इस बात का प्रमाण थी कि अंग्रेज शासन उन्हें कितना बड़ा खतरा मानता था।

भूमिगत आंदोलन और आज़ाद हिन्द रेडियो
पुलिस से बचते हुए वे मुंबई पहुंचे, जहां जयप्रकाश नारायण, अरुणा आसफ अली, अच्युत पटवर्धन और डॉ. राममनोहर लोहिया जैसे क्रांतिकारी भूमिगत रहकर आंदोलन का संचालन कर रहे थे। इन्हीं साथियों के साथ उन्होंने **’आज़ाद हिन्द रेडियो’** के संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उस समय जब अंग्रेजी शासन सूचना पर कड़ा नियंत्रण रखता था, तब यह रेडियो स्वतंत्रता आंदोलन की आवाज़ बनकर उभरा। मदन मोहन उपाध्याय रेडियो ट्रांसमीटर के संचालन जैसे अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य से जुड़े रहे।
उनकी बढ़ती सक्रियता से घबराकर अंग्रेज सरकार ने उनके विरुद्ध डिफेंस ऑफ इंडिया एक्ट के तहत कठोर कार्रवाई की। उन्हें अनुपस्थिति में दंडित किया गया और बाद में 25 वर्ष के कारावास की सजा भी सुनाई गई। अंततः गिरफ्तारी के बाद उन्हें अल्मोड़ा जेल में रखा गया। अंतरिम सरकार बनने के बाद वे अन्य राजनीतिक बंदियों के साथ रिहा हुए।

आज़ादी के बाद सत्ता नहीं, सेवा का रास्ता
15 अगस्त 1947 को जब देश स्वतंत्र हुआ तो मदन मोहन उपाध्याय ने रानीखेत में तिरंगा फहराकर स्वतंत्र भारत का स्वागत किया। स्वतंत्रता के बाद उन्होंने सत्ता को नहीं, बल्कि जनसेवा को प्राथमिकता दी। वे प्रजा सोशलिस्ट पार्टी से जुड़े और 1952 के पहले विधानसभा चुनाव में रानीखेत (उत्तरी) सीट से विजयी होकर उत्तर प्रदेश विधानसभा पहुंचे। वे विधानसभा में विपक्ष के उपनेता भी रहे। उनकी राजनीति का केंद्र सत्ता नहीं, बल्कि जनता थी। शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, पेयजल और विद्युत जैसी मूलभूत सुविधाओं के विकास के लिए उन्होंने लगातार संघर्ष किया।

रानीखेत के विकास की मजबूत नींव
आज रानीखेत जिन विकास कार्यों पर गर्व करता है, उनमें पं. मदन मोहन उपाध्याय का योगदान उल्लेखनीय माना जाता है। रानीखेत सिविल अस्पताल की स्थापना, क्षेत्र में विद्युतीकरण की शुरुआत तथा द्वाराहाट–रानीखेत मोटर मार्ग के निर्माण जैसे अनेक कार्य उनकी दूरदर्शिता और जनप्रतिबद्धता के प्रमाण हैं। उनका मानना था कि किसी भी क्षेत्र का वास्तविक विकास शिक्षा, स्वास्थ्य और सड़क जैसी मूलभूत सुविधाओं से ही संभव है।

आज भी जीवित है उनकी विरासत
1 अगस्त 1978 को रानीखेत में उनका निधन हुआ, लेकिन उनका संघर्ष और योगदान आज भी लोगों की स्मृतियों में जीवित है। उनके सम्मान में रानीखेत छावनी परिषद के एक क्लिनिक तथा द्वाराहाट पीजी कॉलेज का नाम उनके नाम पर रखा गया है। द्वाराहाट के मुख्य चौराहे पर स्थापित उनकी प्रतिमा नई पीढ़ी को उनके संघर्ष की याद दिलाती है। लेकिन उनकी सबसे बड़ी पहचान किसी भवन, सड़क या प्रतिमा से नहीं, बल्कि उस साहस, ईमानदारी और जनसेवा से है, जिसने उन्हें इतिहास के पन्नों में अमर कर दिया। रानीखेत में उनके निवास स्थान को अब उनके पुत्र हिमांशु उपाध्याय एक हेरिटेज होटल के रूप में संचालित करते हैं।

इतिहास का अमर नायक
आज जब राजनीति को अक्सर सत्ता और स्वार्थ के चश्मे से देखा जाता है, तब पंडित मदन मोहन उपाध्याय का जीवन हमें यह सिखाता है कि जनप्रतिनिधि का वास्तविक धर्म जनता की सेवा और राष्ट्र के प्रति समर्पण है। यही कारण है कि लगभग पाँच दशक बाद भी कुमाऊँ की जनता उन्हें केवल एक पूर्व विधायक या स्वतंत्रता सेनानी के रूप में नहीं, बल्कि “कुमाऊँ के टाइगर” के रूप में याद करती है—एक ऐसे योद्धा के रूप में जिसने अंग्रेजी सत्ता से टक्कर ली और स्वतंत्र भारत में विकास की मजबूत नींव रखी। उनका जीवन आज भी आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा, साहस और राष्ट्रभक्ति का जीवंत उदाहरण है।
