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देहरादून के IMA के पीछे मुस्लिम यूनिवर्सिटी बनाये जाने, डेमोग्राफी चेंज की बात निकली कोरी अफवाह, ज़मीन IMA से 14 किमी दूर और ज़मीन 80 हिन्दू व्यक्तियों के नाम। पढ़िए इस मुद्दे की पड़ताल करता हमारा सम्पादकीय लेख।

देहरादून के IMA के पीछे मुस्लिम यूनिवर्सिटी बनाये जाने, डेमोग्राफी चेंज की बात निकली कोरी अफवाह, ज़मीन IMA से 14 किमी दूर और ज़मीन 80 हिन्दू व्यक्तियों के नाम।

उत्तराखंड में देहरादून के IMA के पीछे मुस्लिम यूनिवर्सिटी बनाये जाने का मुद्दा एक बार फिर उत्तराखंड में चर्चा का विषय बना हुआ है। एक वर्ग इस मुद्दे को लेकर आक्रामक मुद्रा में दिखाई दे रहा है लेकिन अब तथ्य सामने आने के बाद ये मुद्दा दक्षिणपंथी समूह के लिए उल्टा साबित होता दिख रहा है। इस मुद्दे के सामने आने के बाद कई पत्रकारों तथा सोशल एक्टिविस्ट ने सच्चाई को सामने रखा है।

2004 में ये ज़मीन एन डी तिवारी सरकार में दिल्ली की संस्था सेक्युलर हिन्द ट्रस्ट, जिसके संचालक देवबंदी उलेमा महमूद मदनी – असद मदनी ने प्रस्ताव दिया कि हम देहरादून के धौलास गांव में ज़मीन खरीद कर स्कूल बनाना चाहते हैं। तिवारी सरकार ने 20 एकड़ ज़मीन में स्कूल बनाने की स्वीकृति दी। इस प्रस्ताव में किसी मदरसे, मस्जिद का नहीं केवल एक स्कूल खोलने की बात कही गई थी। सरकार ने ज़मीन खरीदने के लिए 180 दिन की समय सीमा ट्रस्ट को दी लेकिन इस समय में ट्रस्ट केवल 15.19 एकड़ ज़मीन ही खरीद सका।

सरकार द्वारा जिस प्रकार के स्कूल के लिए अनुमति दी गयी थी, उसके लिए 20 एकड़ ज़मीन का होना आवश्यक था। चूंकि ट्रस्ट केवल 15 एकड़ ज़मीन ही खरीद सका इसलिए तिवारी सरकार ने इस ज़मीन को अपने आधिपत्य में ले लिया और स्कूल बनाने की अनुमति भी रद्द कर दी। 2007 के चुनाव में तिवारी सरकार चुनाव हार गई और उत्तराखंड में भाजपा सरकार का गठन हुआ।

इस बीच सेक्युलर हिन्द ट्रस्ट 2007 में सरकार के फैसले के विरोध में हाईकोर्ट चले जाता है और गुहार लगता कि हमारी ज़मीन को सरकार ने अपने आधिपत्य में ले लिया है। हम यहाँ स्कूल नहीं बना पाए इसलिए अब हमें ये ज़मीन बेचने की अनुमति दी जाए। हाई कोर्ट ने 2007 से 2010 तक चले मुकदमे के बाद अधिकारियों को लताड़ लगते हुए फैसला दिया कि अगर ये स्कूल नहीं बना सकते तो ट्रस्ट को ये अनुमति दी जाती है की वह अपनी ज़मीन को बेच सकते हैं। लेकिन कोर्ट ने ये शर्त लगा दी कि ये वर्तमान में कृषि भूमि है और कृषि भूमि के रूप में ही बेचीं जाएगी, इसका लैंड यूस नहीं बदला जायेगा। 2010 के इस फैसले पर तत्कालीन भाजपा सरकार ने कोई अपील नहीं की और फैसला स्वीकार कर लिया।

इसके बाद ट्रस्ट ने रईस अहमद नाम के व्यक्ति को पावर ऑफ अटॉर्नी दे दी की वह इस ज़मीन को बेच दे। रईस अहमद ने ये ज़मीन बेचना शुरू की और कई बार खरीदते बिकते इस ज़मीन पर अब वर्तमान में यह 15 एकड़ ज़मीन 80 हिन्दू व्यक्तियों और 15 मुस्लिम व्यक्तियों के नाम पर है और यहाँ पर महादेव रेजीडेंसी का एक बोर्ड भी लगा हुआ है।

अभी तक सोशल मीडिया पर ये कहकर लोगों को गुमराह किया जा रहा था कि दिल्ली की संस्था द्वारा IMA के ठीक पीछे ये ज़मीन खरीदी गयी है लेकिन वास्तविकता में ये ज़मीन धौलास गांव में है जो IMA से 14 किलोमीटर दूर है। ऐसे में ये कहना की यहाँ पर किये जाने वाले निर्माण से IMA की सुरक्षा को खतरा है गलत प्रतीत होता है। साथ ही जब यहाँ 80 हिन्दू व्यक्तियों के नाम पर ज़मीन है तो ऐसे में डेमोग्राफी चेंज की बात भी निराधार ही है।


ये बात स्पस्ट है कि सेक्युलर हिन्द ट्रस्ट के द्वारा ज़मीन खरीदते समय ये कृषि भूमि थी और आज भी ये ये कृषि भूमि ही है और बिना इसका लैंड यूस बदले इस पर कोई निर्माण नहीं हो सकता। अगर कोई व्यक्ति ज़मीन का गलत उपयोग करके किसी प्रकार का भवन या व्यावसायिक प्रयोग करता है तो इसे रोकने का अधिकार सरकार के पास है। लेकिन केवल राजनितिक से प्रेरित होकर इस ज़मीन को कुर्क करने की बात करना चुनावी फायदा लेने की बात प्रतीत होता है।

2004 में ज़मीन खरीदते समय और सरकार द्वारा वापस ज़मीन अधिग्रहित करते समय कांग्रेस की सरकार थी। लेकिन 2010 में ज़मीन को दोबारा बेचने की अनुमति मिलते समय और 2022, 2023, 2024, 2025 में प्लॉट बनाकर बेचे जाते समय भी भाजपा सरकार थी। लेकिन भाजपा सरकार ने कभी भी इस पर अपनी आपत्ति नहीं जताई। लेकिन अब भाजपा सरकार ज़मीन कुर्क करने की तैयारी में है।

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