
रानीखेत का वो चौराहा जहाँ दशकों से लकड़ी बेचने के लिए लकड़हारे करते हैं ग्राहकों का इंतज़ार !
जाड़ो में हम सभी को लकड़ी की ज़रुरत पड़ती रहती है, लेकिन अगर रानीखेत में आपको लकड़ी की ज़रुरत पड़े तो कहा जाना चाहिए? आज हम आपको ऐसी ही एक जगह के बारे में बता रहे है, जो ख़ामोशी से दशकों से रानीखेत की लकड़ी की आपूर्ति करती आ रही है।
रानीखेत में छावनी की स्थापना 1869 में हुई थी। लेकिन उस समय रानीखेत के सदर बाजार में भारतीयों के जाने पर रोक थी। सदर बाज़ार में केवल अँगरेज़ ही घूम सकते थे। ऐसे में रानीखेत का ज़रूरी बाजार ही रानीखेत का मुख्य बाजार हुआ करता था, इसलिए इसका नाम ज़रूरी बाजार पड़ा। इसके अलावा खड़ी बाजार में भी बहुत सी दुकाने हुआ करती थी।

उस ज़माने में अधिकांश लोग खुद ही लकड़ी लेने जंगल जाय करते थे, और लकड़हारे भी घर घर जाकर लकड़ी डाल दिया करते थे, और आज भी पहले से डिमांड देने पर लकड़ी आपके घर पर पहुंच जाती है। लेकिन जिन लोगों की लकड़ी नहीं बिक पाती थी वो इसी खड़ी बाजार-ज़रूरी बाजार चौराहे पर लकड़हारे लोगों का इंतज़ार करते थे, और दशकों से ये नियम अघोषित रूप से चला आ रहा है।
अब हीटर और गैस के कारण लकड़ी बेचने वाले कम हो गए हैं। अब ये लोग केवल जाड़ो में ही दिखाई देते है। लेकिन अब भी यदि किसी को लकड़ी बेचने वाला नहीं मिल पाता तो वो इस चौराहे पर आकर लकड़ी की खरीदारी करते देखा जा सकता है।
