
पत्रकार हेम भट्ट की गिरफ़्तारी से सवालों के घेरे में आयी पुलिस की कार्यशैली, घटनाक्रम में किसी दबाव या साजिश की बू।
बीते शनिवार 23 मई को देहरादून में पत्रकार हेम भट्ट की गिरफ्तरी के मामले ने उत्तरखंड पुलिस को एक बार फिर सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया है। 23 मई की सुबह 4 बजे पुलिस जय भारत टीवी के पत्रकार हेम भट्ट को बिना किसी वारंट , या नोटिस के घसीटते हुए किसी दुर्दांत अपराधी की तरह ले गयी। उनको ले जाते समय उनकी पत्नी और बच्चो के सामने उनसे मारपीट भी की गयी। हेम भट्ट की पत्नी दिव्या भट्ट ने कहा कि केवल एक व्यक्ति पुलिस की वर्दी में था जबकि बाकी अन्य 6 – 7 लोग बिना वर्दी के घर में घुसे थे। हिरासत में लेने और कई घंटों की पूछताछ के बाद देहरादून पुलिस ने उन्हें छोड़ दिया।

हेम भट्ट को उठाये जाने की खबर कुछ ही देर में फ़ैल गयी और इस पूरी घटना के तार बीजेपी विधायक अरविंद पांडेय ने अपने एक बयान में कहा था कि हेम भट्ट का गुनाह सिर्फ इतना था कि उन्होंने हाल ही में मेरा इंटरव्यू लिया था। वही कांग्रेस समेत अन्य विपक्षी दल भी इस मामले को लेकर सरकार पर हमलावर हो गए।
वहीं दूसरी तरफ इस मामले में एसपी सिटी प्रमोद कुमार का कहना है कि भूमाफिया प्रदीप सकलानी, जिस पर 26 मुकदमे दर्ज हैं, उसने पूछताछ में हेम भट्ट का नाम लिया था। पुलिस को शक था कि हेम भट्ट उस अपराधी को बचाने और सेटिंग कराने में मदद कर रहे थे। इसी शक की बिनाह पर उन्हें पूछताछ के लिए लाया गया था। हालाँकि बाद में पुलिस ने कहा कि वो गलती से ये वाले हेम भट्ट को ले आयी और उन्हें किसी और हेम भट्ट की तलाश थी।
जिसके बाद आज पत्रकार हेम भट्ट ने वीडियो जारी कर आपबीती सुनाई और कहा कि इस घटना के बाद से वो और उनका परिवार सदमे में है। उन्होंने बताया कि पुलिस ने सुबह चार बजे उन्हें उनके घर से किसी आतंकी की तरह उठाया। वहां से उन्हें अलग-अलग अनजान जगहों पर ले गए। पत्रकार ने कहा आशंका तो ये भी होने लगी थी कि शायद आज उनका एनकाउंटर कर दिया जाएगा। हेम भट्ट ने कहा कि वो प्रदीप सकलानी नाम के किसी भी शख्स को नहीं जानते हैं। हालांकि पत्रकार हेम भट्ट ने कहा कि मेरी इमानदारी पर चोट मारी गई है। मुझे बेइज्जत किया गया। भट्ट ने मांग की है कि पुलिस अपनी गलती माने, वरना वो अपने परिवार के साथ PHQ के बाहर धरने पर बैठेंगे।
उत्तराखंड पुलिस की कार्यशैली पर उठे गंभीर सवाल :
इस पूरे मामले में उत्तराखंड पुलिस की कार्यशैली पर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं। सुबह के अँधेरे में बिना किसी वारंट के एक पत्रकार के घर में घुसना और मारपीट करना किसी भी तरह से न्यायोचित नहीं कहा जा सकता। पुलिस चाहती तो उजाला होने के बाद सामान्य तरीके से नोटिस भेज कर भी उनको पूछताछ के लिए बुला सकती थी। कोई भी आपराधिक रिकॉर्ड ना होने के बाद भी हेम भट्ट के साथ किसी आतंकी या दुर्दांत अपराधी जैसा व्यवहार किया जाना इस मामले के पीछे किसी साजिश के होने का आभास देता है। ऐसा लगता है कि देहरादून पुलिस अपने विवेक से नहीं बल्कि किसी के दबाव में आकर इस तरह की कार्यवाही को अंजाम दे रही थी। क्या पुलिस इतनी लापरवाह हो सकती है की उसे पता ही ना हो की जिस व्यक्ति को हिरासत में लिया जा रहा है वो वाकई में वही व्यक्ति है या कोई और है? इस कार्यवाही के बाद पुलिस कर्मियों पर भी अधिकारी वर्ग द्वारा किसी प्रकार की कार्यवाही ना कर ऐसे पुलिसकर्मियों का हौसला बढ़ने का काम किया है। इस मामले में पुलिस की जांच और दोषी पलिस कर्मियों को ससपेंड किया जाना नितांत आवश्य प्रतीत होता है।
