
विधानसभा परिसीमन 2026 : अगर पहाड़ की सीट घटकर 28 और मैदान की सीट हो जाए 42 , जब सत्ता का रास्ता मैदान से होकर जायेगा तो फिर कैसे और कौन करेगा पहाड़ की बात? ये डरावना आंकड़ा 2026 में हो सकता है सच, पढ़िए हमारा विशेष लेख विस्तार से।
कुछ दिन पहले विधानसभा सत्र में पहाड़ बनाम मैदान की जंग देखने को मिली थी। लेकिन आने वाले विधानसभा चुनाव में पहाड़ को एक बड़ा झटका लगने की पूरी सम्भावना दिखाई दे रही है। पहाड़ और मैदान की इस जंग में मैदान का पलड़ा भारी होता दिखाई दे रहा है। इसका सीधा सा कारण है, विधानसभा सीटों की संख्या, जिस क्षेत्र की जितनी सीटें होंगी उसकी बात उतनी ही सुनी जाएगी और उतनी ही सुविधाएं भी दी जाएगी। ऐसे में राजधानी गैरसैण बनाये जाने की बात भी संभव नहीं दिखाई दे रही है।
दरअसल अगले साल 2026 में देश में जनगणना होनी है, जिसके बाद विधानसभा और लोकसभा सीटों परिसीमन भी किया जायेगा। पिछली जनगणना 2011 में हुई थी, इसके बाद 2021 में जनगणना होनी थी, जो की कोविड-19 के कारण नहीं हो पाई थी। अगले साल जनगणना होने के बाद जो नए आंकड़े सामने आएंगे उसमे पहाड़ में जनसख्यां में कमी और मैदान में जनसख्या बढ़ोतरी होना स्वाभाविक है। पहाड़ लगातार पलायन से खाली हो रहे हैं जबकि मैदान में आबादी में बढ़ोतरी हुई है।

राज्य स्थापना के बाद वर्ष 2001 में हुए परिसीमन के बाद पहाड़ को 40 सीट और मैदान को 30 सीट दी गयी थी, ताकि पहाड़ी राज्य की अवधारणा बनी रहे। लेकिन वर्ष 2008 में हुए परिसीमन के बाद वर्ष 2012 में पहाड़ को पहला झटका लगा जब आबादी घटने के कारण पहाड़ की 6 सीट घटा कर मैदान में में जोड़ दी गई। इसके बाद पहाड़ में विधानसभा सीट घटकर 34 सीट हो गयी और मैदान की सीट 30 से बढ़कर 36 हो गई।
यही से पहाड़ और मैदान की खाई बढ़ना शुरू हुई थी। क्योंकि राजनितिक दलों को समझ आ गया था कि मैदान से ज्यादा सीट जीत कर भी सत्ता में काबिज हुआ जा सकता है। इससे सत्ता के गलियारों में पहाड़ की आवाज़ कमजोर हुई। अल्मोड़ा जिले में भिकियासैण विधानसभा सीट को भी इसी परिसीमन में हटा दिया गया था, आधा इलाका सल्ट विधानसभा सीट में जोड़ा गया और आधा इलाका रानीखेत विधानसभा में जोड़ा गया था।
अब 2011 के बाद से अब तक 15 सालों में भारी संख्या में पहाड़ से पलायन हुआ है। गांव के गांव खाली हो गए है। ऐसे में जब 2026 के जनगणना के आंकड़े सामने आएंगे तो पहाड़ से 5 से 7 सीट तक कम होना निश्चित है। ऐसे में पहाड़ की सीटों की संख्या घटकर 28 के आस पास तो मैदान की विधानसभ सीटों की संख्या 42 के लगभग हो जाएगी। ऐसे में स्पष्ट है की सत्ता चाबी मैदान की सीटों में ही छुपी होंगी। तो 2027 का चुनाव भी मैदान को देखकर लड़ा जायेगा और नीति निर्धारण भी मैदान के अनुसार ही होगा। ये घटना पहाड़ी राज्य की अवधारणा को ही समाप्त कर देगी। पहाड़ के लोग एक बार फिर उसी स्तिथि में
पहुंच जायेंगे जहाँ उत्तराखंड बनने से पहले थे।
