
वर्ष 2000 में प्रस्ताव, 2009 में लोकार्पण – लेकिन 17 साल बाद भी अस्तित्व में नहीं आ पाया है रानीखेत का ट्रामा सेंटर। दुर्घटनाओं में अब तक बचायी जा सकती थी कई लोगों की जान।
रानीखेत उप मण्डल के भिकियासैंण, सल्ट, स्याल्दे, देघाट, द्वाराहाट, चौखुटिया समेत गढ़वाल के विभिन्न इलाको के लिए रानीखेत अस्पताल हमेशा से महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहा है। आस पास के क्षेत्र में कोई सड़क दुर्घटना होने पर यदि रानीखेत में ट्रॉमा सेंटर हो तो हल्द्वानी रेफेर करने में ख़राब होने वाले समय में इलाज कर कई मरीजों के जान बचायी जा सकती है।

रानीखेत में ट्रॉमा सेंटर स्थापित करने की योजना वर्ष 2000 में करीब एक करोड़ रुपये की लागत से स्वीकृत हुई थी। भवन तैयार होने के बाद वर्ष 2009 में तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक ने इसका लोकार्पण किया था। भवन के लोकार्पण के बाद यहाँ विशेषज्ञ,डॉक्टर ,पैरामेडिकल स्टाफ और अत्याधुनिक चिकित्सा उपकरण उपलब्ध नहीं हो सके। जिस कारण करोडो की लागत से तैयार भवन का कोई प्रयोग नहीं हो पाया। खली पड़े भवन का इस्तेमाल चिकित्सकों और अस्पताल स्टाफ के अस्थायी आवास के रूप में किया जाने लगा और यहाँ एक लैब भी खोल दी गई। बाद के वर्षों में भवन में कोविड टीकाकरण भी किया गया।
ट्रॉमा सेंटर के संचालन में लगातार देरी के बीच वर्ष 2020 में इसी भवन को महिला एवं जच्चा-बच्चा अस्पताल के रूप में इस्तेमाल करने का प्रस्ताव सामने आया। उस समय गाइनो वार्ड, प्रसूति कक्ष और ऑक्सीजन प्लांट जैसी सुविधाएं यहां शिफ्ट करने की बात कही गई थी। जिसका स्थानीय स्तर पर कई लोगों ने विरोध भी किया और ट्रॉमा सेंटर स्थापित करने की मांग की।
ट्रॉमा सेंटर को प्रभावी ढंग से चलाने के लिए यहाँ न्यूरो सर्जन, आर्थोपेडिक सर्जन, जनरल सर्जन, रेडियोलॉजिस्ट, एनेस्थेसिस्ट, सीटी स्कैन विशेषज्ञ और पैरामेडिकल स्टाफ की आवश्यकता है। भवन बनने के बाद इन सभी पदों पर नियुक्ति नहीं होने से आज तक रानीखेत में ट्रॉमा सेंटर स्थापित नहीं हो पाया।
रानीखेत उपमंडल समेत गढ़वाल तक इलाकों में दुर्घटना होने के बाद घायल को पहले रानीखेत अस्पताल तक पहुंचाया जाता है और यदि स्थिति गंभीर हो तो उसे हल्द्वानी अथवा दूसरे बड़े चिकित्सा केंद्रों के लिए रेफर किया जाता है। यही दूरी गंभीर मरीज के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन जाती है। दुर्घटना के बाद शुरुआती घंटे बेहद महत्वपूर्ण होते हैं। यदि स्थानीय स्तर पर रक्तस्राव रोकने, फ्रैक्चर स्थिर करने, सांस की समस्या संभालने, तत्काल इमेजिंग करने और जरूरत पड़ने पर ऑपरेशन शुरू करने की सुविधा उपलब्ध हो तो मरीज की जान बचाने की संभावना बढ़ सकती है।
रानीखेत में ट्रामा सेंटर स्थापना का विषय किसी एक सरकार या किसी एक कार्यकाल तक सीमित नहीं रहा है। अलग-अलग समय में सरकारें बदलीं, लेकिन रानीखेत में ट्रामा सेंटर की तरफ किसी भी सरकार ने ध्यान नहीं दिया। रानीखेत और आसपास के पर्वतीय क्षेत्रों की जनता के लिए यह महज अस्पताल का एक भवन नहीं है। यह उन परिवारों की उम्मीद है, जिनका कोई अपना सड़क हादसे में गंभीर रूप से घायल होने पर समय के खिलाफ दौड़ लगाता है।
सवाल आज भी वही है—2009 में जिस ट्रॉमा सेंटर का लोकार्पण हो चुका था, वह 2026 में भी मरीजों के लिए खुला क्यों नहीं है? अगर पिछले 17 सालों से यहाँ ट्रॉमा सेंटर संचालित हो रहा होता तो इन वर्षो में कितने ही लोगों की जान बचायी जा सकती थी।
